Tuesday, 15 January 2013

रास्ते का सच

रास्ते का सच

बड़े-बड़े संस्थान और बड़ी-बड़ी बातें । इसमें मजदूरों की बात करनेवाले मार्क्सवादी , समाज की बात करने वाले समाजवादी और पूंजी के महत्व को समझाने वाले पूंजीवादी विचारधाराएं बहती है । ये संस्थान हैं भारतीय प्रौधोगिकी  संस्थान ,भारतीय जनसंचार संस्थान तथा जवाहरलाल नेहरु विश्वविधालय  ।

                               इन संस्थानो के बीच से कई सड़कें गुजरती हैं । इन सड़कों पर बड़ी संख्या में दो से दस वर्ष के बच्चे भीख मांगते पाये जाते हैं । जिस उम्र के बच्चे हमारे घरों में सही से बोल नहीं पाते उस उम्र के बच्चे यहां चमकती कारों को साफ करता है । वे तेजी से आते-जाते गाड़ियों के चपेट मे आ सकते हैं । लेकिन इस ओर न तो प्रशासन का ध्यान जाता है और न हीं इन विश्वविधालयों में बैठकर बहस करनेवाले मार्क्सवादी-समाजवादी बुधिजीवियों का । पत्रकारों की तो बात हीं छोड़ दीजिए । ये तो वहीं लिखेगा जिसे लोग जानना चाहते हैं । आखिर इन बेसहारा बच्चों के बारे में कौन जानना चाहेगा ? 

                             इन सड़कों से सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीश भी गुजरते हैं । लेकिन इनके पास पहले से हीं लाखों मामले अटके पड़े हैं । ये क्यों जुडिशियल एक्टीविज्म दिखायेगें ? इन्हें कानून में ये तो सिखाय़ा हीं नहीं जाता कि दो वर्ष के बच्चे से कार साफ करवाना अपराध है । धन्य हो हमारा संविधान ।

                             रोज की तरह आज भी मैनें िइन बच्चों को भीख मांगते देखा । लेकिन आज कुछ नया था ।       चार-पांच बच्चे कगज-कलम लेकर गोलाकार बनाये बैठा था । ये बच्चे जमा की गयी राशि का हिसाब कर रहे थे  । ये वो बच्चे हैं जिसे पढ़ने के लिये मां-बाप पिटाई नहीं करते । पैसे की जरुरत ने इसे कागज-कलम पकड़ा दिया है । खुद से इनलोगों ने जोड़-घटाव सिख लिया है । इतनी कुशलता से ये लोग जोड़-घटाव कर रहे थे जितनी कुशलता हमलोग देश के शीर्ष संस्थानों में नहीं दिखाते हैं । इन स्वेच्छा से पकड़े गये कलम में स्याही भरने की जरूरत है । इनकी लेखनी ब्लॉग लिखनेवालों से ज्यादा धारदार होगी ।

Monday, 14 January 2013

अमेरिका तालिबान समझौता


अमेरिका तालिबान समझौता


अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफगानिस्तान में अपनी  जीत की घोषणा कर दी । िउन्होंने रेडियो पर जारी संदेश में कहा है कि 11 वर्षों से जारी लड़ाई खत्म हो चुकी है । हमनें अलकायदा को नष्ट कर दिया है (wasington had achieved its prime goal of "dicapitating" al-queda ) । अब अलकायदा अमेरिका पर हमला करने के लिये  अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल नहीं कर सकता है  ,लेकिन उन्होंनें तालिबान को खत्म करने की बात नहीं की  । उन्होंनें आगे कहा कि "  we have pushed the taliban out of thier strogholds  । "
       
                       तालिबान अफगानिस्तान  का बहुत पुराना संगठन है । इसे कमजोर तो किया जा सकता है लेकिन खत्म नहीं । इसका मुख्य कारण यह है कि इसे बड़े पैमानें पर अफगान नागरिकों का समर्थन प्राप्त है । राष्ट्रपति हामिद करजई इसके महत्व को पहले से ही समझते रहे हैं ।  वे कई बार इनसे समझौता करने का प्रयास कर चुके हैं । करजई की अमेरिकी यात्रा (शनिवार 12 जनवरी ) इसी वार्ता को आगे बढ़ाने के लिये की गयी थी  । आखिर में अमेरिका तालिबान से वार्ता के लिये राजी  हो गया है । तालिबान को कत्तर में अपने राजनीतिक कार्यालय खोलने की अनुमति दे दी गई है ताकि तालिबान लड़ाकों को वार्ता की मेज पर लाया जा सके । 

                    यह महत्वपूर्ण समझौता है क्योंकि अमरिका जिसे खत्म करने की बात कर रहा था उसके साथ शांति वार्ता के लिये राजी हुआ है  । शायद अमेरिका को समझ में आ गया है कि सिर्फ बंदुक के दम पर लड़ाई नहीं जीती जाती  । नि:सन्देह रुप से यह अमेरिका की सराहनीय पहल है  । िइससे अमेरिका युध के बाद बचे चिंगारी को सुरक्षित तरीके से किनारे  लगा सकता है ।  यह अमेरिका से ज्यादा भारत के लिये फायदेमंद है क्योंकि तालिबान और अलकायदा अब अमेरिका पर हमला करने में सक्षम नहीं है लेकिन वह भारत में पांव पसार सकता है 

Wednesday, 9 January 2013

विज्ञान की भाषा

विज्ञान की भाषा

भारतीय विज्ञान कांग्रेस का 100वॉं बैठक कलकता में आयोजित की गयी । इसे प्रधान मंत्री एवं राष्ट्रपति दोनों ने संबोधित किया । प्रधानमंत्री ने भारत के विज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ने पर चिंता जतायी । उऩ्होंने भारतीय विज्ञान नीति के माध्यम से देश को विज्ञान के क्षेत्र आगे ले जाने की बात कही । 

                           विज्ञान नीति के लक्ष्य 

                                          -  -  विज्ञान के माध्यम से आर्थिक विकास को गति देना 
                                          - -  2020 तक शीर्ष पांच वैज्ञानिक देशों में शामिल करना 
                                          - -  समाज के हर वर्ग में वैज्ञानिक रुझान पैदा करना 
                                          - -   विज्ञान के प्रति प्रतिभाशाली छात्रों को प्रेरित करना 
                                          - -   शोध कार्यों पर खर्च 1 फीसदी से बढाकर 2 फीसदी करना
                                          -  -  खेती और आम लोगों से जुड़े शोध को बढावा देना 
                                          -  -  शोध के लिये ग्लोबल ढांचा तैयार करना 
                                          -  -  शोध के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढाना
                                          -  -  पांच साल में वैज्ञानिकों की संख्या बढाकर 66 फीसदी करना 

रविवार 6 जनवरी को इस मुद्दे पर राज्यसभा  टीवी में चर्चा आयोजित की गयी थी । इसमें देश के कई प्रमुख वैज्ञानिकों ने भाग लिया । इसमें अंतरीक्ष  वैज्ञानिक अमिताभ पांडे , जे एन य़ू के प्रोफेसर राजारमन ,प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के सदस्य सैयदी हसनैन एवं दिल्ली साइंस फोरम के सदस्य प्रवीर पुरकायस्थ शामिल थे । इस चर्चा में मुझे भाग लेने का अवसर मिला ।

                  इसमें मैने एक प्रश्न पुछा । उच्च शिक्षा में विज्ञान की पढाई के लिए देशी भाषाओं को बढ़ावा क्यों नहीं दी जाती ? हमारे पास चीन , जापान , रुस जैसे कई देशों के उदाहरण हैं जिसने अपनी भाषा के दम पर विज्ञान के क्षेत्र में विकास किया है । समाज के हर वर्ग विज्ञान में कैसे आयेगा जब विज्ञान की भाषा अंग्रेजी होगी । हमारे देश के लगभग दो तिहाई छात्र देशी भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करते हैं । अधिकांश छात्र उच्च कक्षाओं विज्ञान इसलिये नहीं लेते हैं क्योंकि िइसकी पढाई के लिये पुस्तकें उपलब्ध नहीं है । जरुरत इस बात की है कि उच्च अध्ययन के लिये देशी भाषाओं में पुस्तकें लिखीं जाये और शोध को बढावा दिया जाय ।

                लेकिन इन वैज्ञानिकों का कहना था कि " विज्ञान की एक भाषा होती है जिसे आपको सीखनी हीं होगी । " इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे वैज्ञानिक मान चुके हैं कि विज्ञान की भाषा अंग्रेजी है ।  क्या सचमुच में विज्ञान की भाषा होती है ? अगर ऐसा होता तो आर्यभट्ट शून्य का खोज नहीं कर पाता । न हीं सूर्य का सिधांत दिया होता क्योकि उस समय भारत मे अंग्रेजी नहीं थी ।