रास्ते का सच
बड़े-बड़े संस्थान और बड़ी-बड़ी बातें । इसमें मजदूरों की बात करनेवाले मार्क्सवादी , समाज की बात करने वाले समाजवादी और पूंजी के महत्व को समझाने वाले पूंजीवादी विचारधाराएं बहती है । ये संस्थान हैं भारतीय प्रौधोगिकी संस्थान ,भारतीय जनसंचार संस्थान तथा जवाहरलाल नेहरु विश्वविधालय ।
इन संस्थानो के बीच से कई सड़कें गुजरती हैं । इन सड़कों पर बड़ी संख्या में दो से दस वर्ष के बच्चे भीख मांगते पाये जाते हैं । जिस उम्र के बच्चे हमारे घरों में सही से बोल नहीं पाते उस उम्र के बच्चे यहां चमकती कारों को साफ करता है । वे तेजी से आते-जाते गाड़ियों के चपेट मे आ सकते हैं । लेकिन इस ओर न तो प्रशासन का ध्यान जाता है और न हीं इन विश्वविधालयों में बैठकर बहस करनेवाले मार्क्सवादी-समाजवादी बुधिजीवियों का । पत्रकारों की तो बात हीं छोड़ दीजिए । ये तो वहीं लिखेगा जिसे लोग जानना चाहते हैं । आखिर इन बेसहारा बच्चों के बारे में कौन जानना चाहेगा ?
इन सड़कों से सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीश भी गुजरते हैं । लेकिन इनके पास पहले से हीं लाखों मामले अटके पड़े हैं । ये क्यों जुडिशियल एक्टीविज्म दिखायेगें ? इन्हें कानून में ये तो सिखाय़ा हीं नहीं जाता कि दो वर्ष के बच्चे से कार साफ करवाना अपराध है । धन्य हो हमारा संविधान ।
रोज की तरह आज भी मैनें िइन बच्चों को भीख मांगते देखा । लेकिन आज कुछ नया था । चार-पांच बच्चे कगज-कलम लेकर गोलाकार बनाये बैठा था । ये बच्चे जमा की गयी राशि का हिसाब कर रहे थे । ये वो बच्चे हैं जिसे पढ़ने के लिये मां-बाप पिटाई नहीं करते । पैसे की जरुरत ने इसे कागज-कलम पकड़ा दिया है । खुद से इनलोगों ने जोड़-घटाव सिख लिया है । इतनी कुशलता से ये लोग जोड़-घटाव कर रहे थे जितनी कुशलता हमलोग देश के शीर्ष संस्थानों में नहीं दिखाते हैं । इन स्वेच्छा से पकड़े गये कलम में स्याही भरने की जरूरत है । इनकी लेखनी ब्लॉग लिखनेवालों से ज्यादा धारदार होगी ।