Sunday, 8 September 2013

सीरिया में मानवाधिकार बनाम विशेषाधिकार की लड़ाई

सीरिया में मानवाधिकार बनाम विशेषाधिकार की लड़ाई
शेखरसुमन सिन्हा
नई दिल्ली, 7 सितम्बर 2013
विश्व एकबार फिर से युद्ध की ओर बढ़ रहा है । सीरिया में अव्यवस्था के मुद्दे पर अमेरिका और रुस ने भूमध्यसागर में अपनी-अपनी मिसाईलें तैनात कर रखा हैं । अमेरिका का कहना है कि हम मानवाधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं , जबकि दूसरी ओर रुस का कहना है कि हम विशेषाधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं ।
           लंबे समय से सता पर काबिज सीरिया के राष्ट्रपति बसर-अल-असद का कहना है कि हमारे राष्ट्र में बाहरी ताकतों को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है । इस तरह का कदम हमारी संप्रभूता का हनन करेगा । दरअसल इस मामले में यह समझना जरुरी है कि संप्रभूता राष्ट्र में निहित होता है या राष्ट्रपति में।
           संप्रभूता(sovereignty)शब्द लैटिन भाषा के supernusसे बनी है । इसका अर्थ है सर्वोच्चता । प्रारंभ में यह कहा गया कि संप्रभूता  अविभाज्य और निरपेक्ष्य है जिसे केवल दैविक शक्ति से हीं रोका जा सकता है । सन् 1648 में वेस्टफेलिया की संधि से नए राष्ट्र-राज्य की स्थापना के समय संप्रभूता शब्द का विकास हुआ । अंतर्राष्ट्रीय कानून के पिता (father of international law) कहे जाने वाले ह्यूगो ग्रोसियस ने कहा कि संप्रभूता सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति है जो जनता(नागरिकों) में निहित होती है ।
   राज्य और संप्रभूता के आधुनिक परिभाषाओं से स्पष्ट है कि अगर किसी सरकार को जनता का विश्वास प्राप्त नहीं है तो उसे तत्काल पद छोड़ देनी चाहिए । सीरिया  में अबतक 50 हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं । यह कोई चीटियों के आंकड़े नहीं हैं । यह मनुष्यों के आंकड़े हैं । पूरा सीरिया गृहयुद्ध का शिकार है । प्रतिदिन सैकड़ों लोग मारे जा रहे हैं । बसर अल असद जनता का विश्वास खो चुका है । वह सेना के माध्यम से सरकार चला रहा है । इसलिए वह जनता और राष्ट्र में निहित संप्रभूता जैसे विशेषाधिकार के प्रयोग का हक खो चुका है । उसके संप्रभूता के दलीलों पर विश्व के देशों को उसका समर्थन नहीं करना चाहिए,क्योंकि वहां रहनेवाले लोगों के मानवाधिकार बसर अल असद के विशेषाधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण है ।
               संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणापत्र 1948 पर हस्ताक्षरकर्ता देश विश्व में कहीं भी मानवाधिकार हनन रोकने के लिए प्रतिबद्ध है, इसलिए सीरिया में अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को मिलकर कार्रवाई करनी चाहिए । इस पत्र के अनुच्छेद 21 में स्पष्ट कहा गया है कि जनता कि इच्छा हीं सरकार की सत्ता का आधार होगा,लेकिन सरकार में तो कहीं भी जनता की इच्छा नहीं झलकती है ।
अमेरिका सीरिया पर सीमित आक्रमण करना चाहता है क्योंकि सीरिया ने अपने हीं जनता पर रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया है । इस मामले में रुस सहित कई राष्ट्रों का मानना है कि इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि रासायनिक हथियारों  का प्रयोग सीरिया सरकार ने हीं किया है । अगर हम इस बात को मान भी लें कि रासायनिक हथियारों का प्रयोग सीरिया सरकार ने नहीं किया है,तो फिर अभी तक जो लाखों लोग मारे गये हैं, उसका क्या ? लाखों लोग किसी बड़े युद्ध में हीं मारे जाते हैं, लेकिन यहां तो बसर अल असद की तानाशाही से लाखों लोग मारे गये हैं । क्या किसी तानाशाह को यू हीं लाखों लोगों को मारने की आजादी होनी चाहिए ? तो फिर संयुक्त राष्ट्र और उसके मानवाधिकार घोषणापत्र का क्या फायदा ? केवल इस मानवाधिकार हनन के  मुद्दे पर  हीं बसर अल असद पर कार्रवाई होनी चाहिए थी । लेकिन विश्व के देशों ने मानवाधिकारों की रक्षा के बजाय , अपने-अपने राजनीतिक हित पर ज्यादा जोर दिया ।
          भारत के अहस्तक्षेप की नीति भी इस मामले में सही नहीं है, क्योंकि अब वैश्विक परिदृश्य बदल चुका है । एक देश की अव्यवस्था का प्रभाव पूरी दुनियां पर पड़ता है । भारत सहित कई देशों की मुद्रा में गिरावट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है । इस तरह की राजनीतिक अव्यवस्था आतंकवादी घटनाओं को भी बढ़ावा देती है । इस तरह के मामलें में भले आप दूर रहें, लेकिन आपपर उसका प्रभाव पड़ना हीं है । तो फिर क्यों नहीं एक वैश्विक निस्कर्ष पर पहुंचा जाये ? इस तरह आज के समय में एक तर्कसंगत हस्तक्षेप की नीति अहस्तक्षेप की नीति से ज्यादा बेहतर है ।
          संयुक्त राष्ट्र ,रुस ,चीन सहित कई राष्ट्र मानते हैं कि अमेरिका का एकतरफा हस्तक्षेप उसके आक्रमकता को दर्शाता है । तब सबाल यह उठता है कि कोई राष्ट्र मानवाधिकारों की रक्षा में आक्रमकता नहीं दिखायेगा ,तो फिर और किसमें दिखायेगा । हालांकि वियतनाम , इराक ,अफगानिस्तान में अमेरिकी हस्तक्षेप का परिणाम बहुत बुरा रहा था, लेकिन सीरिया का मामला उससे अलग है हैं । लाखों लोग अपने हीं देश में शरणार्थी बनकर रह रहें हैं । इसके बाबजूद भी राष्ट्रपति बसर अल असद विश्व समुदाय की बात मानने को तैयार नहीं है । आम जनता सड़कों पर है । क्या कोई व्यक्ति राष्ट्र से उपर है ? राष्ट्र व्यक्ति के लिए या फिर व्यक्ति राष्ट्र के लिए ? उस विशेषाधिकार (संप्रभूता) का क्या मतलब जो मानवाधिकारों की रक्षा हीं न कर सके ?










Friday, 29 March 2013

आदमी को आदमी ही रहने दो


आदमी को आदमी हीं रहने दो

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आदमी को आदमी हीं रहने दो ,
न साम्यवादी बनाओ न पूंजीवादी बनाओ ,
न हिन्दू बनाओ न मुसलमान बनाओ ।

खो जायेगी मानवता रंगों की रेस में ,
आदमी दिखेगा आतंकी के भेष में ।

कला बंध जायेगी देश की सीमाओं में ,
धर्मगुरू सोयेगें सुंदरियों की बाहों में ।

पैसा हीं बन जायेगी लोकतंत्र की महारानी ,
नेता गढेगें इंसानियत की कहानी ।

उदारीकरण की मलाई खायेगें अम्बानी ,
आप तरसेगें बिन खाना बिन पानी ।

Tuesday, 15 January 2013

रास्ते का सच

रास्ते का सच

बड़े-बड़े संस्थान और बड़ी-बड़ी बातें । इसमें मजदूरों की बात करनेवाले मार्क्सवादी , समाज की बात करने वाले समाजवादी और पूंजी के महत्व को समझाने वाले पूंजीवादी विचारधाराएं बहती है । ये संस्थान हैं भारतीय प्रौधोगिकी  संस्थान ,भारतीय जनसंचार संस्थान तथा जवाहरलाल नेहरु विश्वविधालय  ।

                               इन संस्थानो के बीच से कई सड़कें गुजरती हैं । इन सड़कों पर बड़ी संख्या में दो से दस वर्ष के बच्चे भीख मांगते पाये जाते हैं । जिस उम्र के बच्चे हमारे घरों में सही से बोल नहीं पाते उस उम्र के बच्चे यहां चमकती कारों को साफ करता है । वे तेजी से आते-जाते गाड़ियों के चपेट मे आ सकते हैं । लेकिन इस ओर न तो प्रशासन का ध्यान जाता है और न हीं इन विश्वविधालयों में बैठकर बहस करनेवाले मार्क्सवादी-समाजवादी बुधिजीवियों का । पत्रकारों की तो बात हीं छोड़ दीजिए । ये तो वहीं लिखेगा जिसे लोग जानना चाहते हैं । आखिर इन बेसहारा बच्चों के बारे में कौन जानना चाहेगा ? 

                             इन सड़कों से सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीश भी गुजरते हैं । लेकिन इनके पास पहले से हीं लाखों मामले अटके पड़े हैं । ये क्यों जुडिशियल एक्टीविज्म दिखायेगें ? इन्हें कानून में ये तो सिखाय़ा हीं नहीं जाता कि दो वर्ष के बच्चे से कार साफ करवाना अपराध है । धन्य हो हमारा संविधान ।

                             रोज की तरह आज भी मैनें िइन बच्चों को भीख मांगते देखा । लेकिन आज कुछ नया था ।       चार-पांच बच्चे कगज-कलम लेकर गोलाकार बनाये बैठा था । ये बच्चे जमा की गयी राशि का हिसाब कर रहे थे  । ये वो बच्चे हैं जिसे पढ़ने के लिये मां-बाप पिटाई नहीं करते । पैसे की जरुरत ने इसे कागज-कलम पकड़ा दिया है । खुद से इनलोगों ने जोड़-घटाव सिख लिया है । इतनी कुशलता से ये लोग जोड़-घटाव कर रहे थे जितनी कुशलता हमलोग देश के शीर्ष संस्थानों में नहीं दिखाते हैं । इन स्वेच्छा से पकड़े गये कलम में स्याही भरने की जरूरत है । इनकी लेखनी ब्लॉग लिखनेवालों से ज्यादा धारदार होगी ।

Monday, 14 January 2013

अमेरिका तालिबान समझौता


अमेरिका तालिबान समझौता


अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफगानिस्तान में अपनी  जीत की घोषणा कर दी । िउन्होंने रेडियो पर जारी संदेश में कहा है कि 11 वर्षों से जारी लड़ाई खत्म हो चुकी है । हमनें अलकायदा को नष्ट कर दिया है (wasington had achieved its prime goal of "dicapitating" al-queda ) । अब अलकायदा अमेरिका पर हमला करने के लिये  अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल नहीं कर सकता है  ,लेकिन उन्होंनें तालिबान को खत्म करने की बात नहीं की  । उन्होंनें आगे कहा कि "  we have pushed the taliban out of thier strogholds  । "
       
                       तालिबान अफगानिस्तान  का बहुत पुराना संगठन है । इसे कमजोर तो किया जा सकता है लेकिन खत्म नहीं । इसका मुख्य कारण यह है कि इसे बड़े पैमानें पर अफगान नागरिकों का समर्थन प्राप्त है । राष्ट्रपति हामिद करजई इसके महत्व को पहले से ही समझते रहे हैं ।  वे कई बार इनसे समझौता करने का प्रयास कर चुके हैं । करजई की अमेरिकी यात्रा (शनिवार 12 जनवरी ) इसी वार्ता को आगे बढ़ाने के लिये की गयी थी  । आखिर में अमेरिका तालिबान से वार्ता के लिये राजी  हो गया है । तालिबान को कत्तर में अपने राजनीतिक कार्यालय खोलने की अनुमति दे दी गई है ताकि तालिबान लड़ाकों को वार्ता की मेज पर लाया जा सके । 

                    यह महत्वपूर्ण समझौता है क्योंकि अमरिका जिसे खत्म करने की बात कर रहा था उसके साथ शांति वार्ता के लिये राजी हुआ है  । शायद अमेरिका को समझ में आ गया है कि सिर्फ बंदुक के दम पर लड़ाई नहीं जीती जाती  । नि:सन्देह रुप से यह अमेरिका की सराहनीय पहल है  । िइससे अमेरिका युध के बाद बचे चिंगारी को सुरक्षित तरीके से किनारे  लगा सकता है ।  यह अमेरिका से ज्यादा भारत के लिये फायदेमंद है क्योंकि तालिबान और अलकायदा अब अमेरिका पर हमला करने में सक्षम नहीं है लेकिन वह भारत में पांव पसार सकता है 

Wednesday, 9 January 2013

विज्ञान की भाषा

विज्ञान की भाषा

भारतीय विज्ञान कांग्रेस का 100वॉं बैठक कलकता में आयोजित की गयी । इसे प्रधान मंत्री एवं राष्ट्रपति दोनों ने संबोधित किया । प्रधानमंत्री ने भारत के विज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ने पर चिंता जतायी । उऩ्होंने भारतीय विज्ञान नीति के माध्यम से देश को विज्ञान के क्षेत्र आगे ले जाने की बात कही । 

                           विज्ञान नीति के लक्ष्य 

                                          -  -  विज्ञान के माध्यम से आर्थिक विकास को गति देना 
                                          - -  2020 तक शीर्ष पांच वैज्ञानिक देशों में शामिल करना 
                                          - -  समाज के हर वर्ग में वैज्ञानिक रुझान पैदा करना 
                                          - -   विज्ञान के प्रति प्रतिभाशाली छात्रों को प्रेरित करना 
                                          - -   शोध कार्यों पर खर्च 1 फीसदी से बढाकर 2 फीसदी करना
                                          -  -  खेती और आम लोगों से जुड़े शोध को बढावा देना 
                                          -  -  शोध के लिये ग्लोबल ढांचा तैयार करना 
                                          -  -  शोध के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढाना
                                          -  -  पांच साल में वैज्ञानिकों की संख्या बढाकर 66 फीसदी करना 

रविवार 6 जनवरी को इस मुद्दे पर राज्यसभा  टीवी में चर्चा आयोजित की गयी थी । इसमें देश के कई प्रमुख वैज्ञानिकों ने भाग लिया । इसमें अंतरीक्ष  वैज्ञानिक अमिताभ पांडे , जे एन य़ू के प्रोफेसर राजारमन ,प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के सदस्य सैयदी हसनैन एवं दिल्ली साइंस फोरम के सदस्य प्रवीर पुरकायस्थ शामिल थे । इस चर्चा में मुझे भाग लेने का अवसर मिला ।

                  इसमें मैने एक प्रश्न पुछा । उच्च शिक्षा में विज्ञान की पढाई के लिए देशी भाषाओं को बढ़ावा क्यों नहीं दी जाती ? हमारे पास चीन , जापान , रुस जैसे कई देशों के उदाहरण हैं जिसने अपनी भाषा के दम पर विज्ञान के क्षेत्र में विकास किया है । समाज के हर वर्ग विज्ञान में कैसे आयेगा जब विज्ञान की भाषा अंग्रेजी होगी । हमारे देश के लगभग दो तिहाई छात्र देशी भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करते हैं । अधिकांश छात्र उच्च कक्षाओं विज्ञान इसलिये नहीं लेते हैं क्योंकि िइसकी पढाई के लिये पुस्तकें उपलब्ध नहीं है । जरुरत इस बात की है कि उच्च अध्ययन के लिये देशी भाषाओं में पुस्तकें लिखीं जाये और शोध को बढावा दिया जाय ।

                लेकिन इन वैज्ञानिकों का कहना था कि " विज्ञान की एक भाषा होती है जिसे आपको सीखनी हीं होगी । " इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे वैज्ञानिक मान चुके हैं कि विज्ञान की भाषा अंग्रेजी है ।  क्या सचमुच में विज्ञान की भाषा होती है ? अगर ऐसा होता तो आर्यभट्ट शून्य का खोज नहीं कर पाता । न हीं सूर्य का सिधांत दिया होता क्योकि उस समय भारत मे अंग्रेजी नहीं थी ।

          

Friday, 21 September 2012

आखिर हम पानी क्यों खरीदें ?

 

शेखर सुमन सिन्हा ; नई दिल्ली ,21 सितम्बर 

हवा के बाद पानी जीवन की सबसे मूलभूत  आवश्यकता है  .  यह एक प्राकृतिक संसाधन है  . इसपर मनुष्य  के साथ -साथ पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव जंतुओ  का बराबर का अधिकार है .संयुक्त राष्ट्र  ने जुलाई 2010 में स्वच्छ जल को मानवाधिकार  घोषित किया है .भारतीय संविधान भी जीवन के अधिकार (अनु0-21) के अंतर्गत स्वच्छ जल को मौलिक अधिकार मानती है .लेकिन फिर भी इसे हम खरीद कर पीते है .
     
                             सवाल यह है कि आखिर हम इसे क्यों खरीदें ?हम तो लाखों वर्षों से नदी ,नाले , झरनों  एवं तालावों के पानी को स्वच्छ तरीकों  से प्रयोग करते आ रहें हैं . इसे हमने दूषित नहीं किया है .  देश - विदेश के बड़े -बड़े कंपनियों ने इसे दूषित किया है . अब वहीँ कम्पनियाँ इसे साफ कर हमें बेच रही  है .यह कहाँ का न्याय है कि गंदगी कोई और फैलाये और सफाई का पैसा कोई और दे ? ये कम्पनियाँ पानी को दूषित करने के दोषी हैं।

                             हमलोग तो कंपनियों द्वारा साफ किया  पानी  खरीद भी लेते हैं : उन जीव -जंतुओं का क्या होगा जो पूरी तरह नदी -तलावों के पानी पर निर्भर है ? ये जीव -जंतु  डालर और रूपया कहाँ से लायेंगें ? अगर ये प्यासे  मरते हैं तो इसका दोषी कौन होगा ?