Wednesday, 9 January 2013

विज्ञान की भाषा

विज्ञान की भाषा

भारतीय विज्ञान कांग्रेस का 100वॉं बैठक कलकता में आयोजित की गयी । इसे प्रधान मंत्री एवं राष्ट्रपति दोनों ने संबोधित किया । प्रधानमंत्री ने भारत के विज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ने पर चिंता जतायी । उऩ्होंने भारतीय विज्ञान नीति के माध्यम से देश को विज्ञान के क्षेत्र आगे ले जाने की बात कही । 

                           विज्ञान नीति के लक्ष्य 

                                          -  -  विज्ञान के माध्यम से आर्थिक विकास को गति देना 
                                          - -  2020 तक शीर्ष पांच वैज्ञानिक देशों में शामिल करना 
                                          - -  समाज के हर वर्ग में वैज्ञानिक रुझान पैदा करना 
                                          - -   विज्ञान के प्रति प्रतिभाशाली छात्रों को प्रेरित करना 
                                          - -   शोध कार्यों पर खर्च 1 फीसदी से बढाकर 2 फीसदी करना
                                          -  -  खेती और आम लोगों से जुड़े शोध को बढावा देना 
                                          -  -  शोध के लिये ग्लोबल ढांचा तैयार करना 
                                          -  -  शोध के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढाना
                                          -  -  पांच साल में वैज्ञानिकों की संख्या बढाकर 66 फीसदी करना 

रविवार 6 जनवरी को इस मुद्दे पर राज्यसभा  टीवी में चर्चा आयोजित की गयी थी । इसमें देश के कई प्रमुख वैज्ञानिकों ने भाग लिया । इसमें अंतरीक्ष  वैज्ञानिक अमिताभ पांडे , जे एन य़ू के प्रोफेसर राजारमन ,प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के सदस्य सैयदी हसनैन एवं दिल्ली साइंस फोरम के सदस्य प्रवीर पुरकायस्थ शामिल थे । इस चर्चा में मुझे भाग लेने का अवसर मिला ।

                  इसमें मैने एक प्रश्न पुछा । उच्च शिक्षा में विज्ञान की पढाई के लिए देशी भाषाओं को बढ़ावा क्यों नहीं दी जाती ? हमारे पास चीन , जापान , रुस जैसे कई देशों के उदाहरण हैं जिसने अपनी भाषा के दम पर विज्ञान के क्षेत्र में विकास किया है । समाज के हर वर्ग विज्ञान में कैसे आयेगा जब विज्ञान की भाषा अंग्रेजी होगी । हमारे देश के लगभग दो तिहाई छात्र देशी भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करते हैं । अधिकांश छात्र उच्च कक्षाओं विज्ञान इसलिये नहीं लेते हैं क्योंकि िइसकी पढाई के लिये पुस्तकें उपलब्ध नहीं है । जरुरत इस बात की है कि उच्च अध्ययन के लिये देशी भाषाओं में पुस्तकें लिखीं जाये और शोध को बढावा दिया जाय ।

                लेकिन इन वैज्ञानिकों का कहना था कि " विज्ञान की एक भाषा होती है जिसे आपको सीखनी हीं होगी । " इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे वैज्ञानिक मान चुके हैं कि विज्ञान की भाषा अंग्रेजी है ।  क्या सचमुच में विज्ञान की भाषा होती है ? अगर ऐसा होता तो आर्यभट्ट शून्य का खोज नहीं कर पाता । न हीं सूर्य का सिधांत दिया होता क्योकि उस समय भारत मे अंग्रेजी नहीं थी ।

          

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