सीरिया में मानवाधिकार बनाम विशेषाधिकार की लड़ाई
शेखरसुमन
सिन्हा
नई दिल्ली,
7 सितम्बर 2013
विश्व एकबार फिर से युद्ध की ओर बढ़ रहा है ।
सीरिया में अव्यवस्था के मुद्दे पर अमेरिका और रुस ने भूमध्यसागर में अपनी-अपनी
मिसाईलें तैनात कर रखा हैं । अमेरिका का कहना है कि हम मानवाधिकारों की रक्षा के
लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं , जबकि दूसरी ओर रुस का कहना है कि हम
विशेषाधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं ।
लंबे समय से सता पर काबिज सीरिया के राष्ट्रपति बसर-अल-असद का कहना है कि
हमारे राष्ट्र में बाहरी ताकतों को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है । इस तरह
का कदम हमारी संप्रभूता का हनन करेगा । दरअसल इस मामले में यह समझना जरुरी है कि
संप्रभूता राष्ट्र में निहित होता है या राष्ट्रपति में।
संप्रभूता(sovereignty)शब्द लैटिन भाषा के supernusसे बनी है । इसका अर्थ है सर्वोच्चता । प्रारंभ
में यह कहा गया कि संप्रभूता अविभाज्य और
निरपेक्ष्य है जिसे केवल दैविक शक्ति से हीं रोका जा सकता है । सन् 1648 में
वेस्टफेलिया की संधि से नए राष्ट्र-राज्य की स्थापना के समय संप्रभूता शब्द का
विकास हुआ । अंतर्राष्ट्रीय कानून के पिता (father of international law) कहे जाने वाले ह्यूगो ग्रोसियस ने कहा कि “संप्रभूता सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति है जो
जनता(नागरिकों) में निहित होती है ।“
राज्य
और संप्रभूता के आधुनिक परिभाषाओं से स्पष्ट है कि अगर किसी सरकार को जनता का
विश्वास प्राप्त नहीं है तो उसे तत्काल पद छोड़ देनी चाहिए । सीरिया में अबतक 50 हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके
हैं । यह कोई चीटियों के आंकड़े नहीं हैं । यह मनुष्यों के आंकड़े हैं । पूरा
सीरिया गृहयुद्ध का शिकार है । प्रतिदिन सैकड़ों लोग मारे जा रहे हैं । बसर अल असद
जनता का विश्वास खो चुका है । वह सेना के माध्यम से सरकार चला रहा है । इसलिए वह
जनता और राष्ट्र में निहित संप्रभूता जैसे विशेषाधिकार के प्रयोग का हक खो चुका है
। उसके संप्रभूता के दलीलों पर विश्व के देशों को उसका समर्थन नहीं करना
चाहिए,क्योंकि वहां रहनेवाले लोगों के मानवाधिकार बसर अल असद के विशेषाधिकार से
ज्यादा महत्वपूर्ण है ।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणापत्र 1948 पर
हस्ताक्षरकर्ता देश विश्व में कहीं भी मानवाधिकार हनन रोकने के लिए प्रतिबद्ध है,
इसलिए सीरिया में अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को मिलकर कार्रवाई करनी चाहिए । इस पत्र
के अनुच्छेद 21 में स्पष्ट कहा गया है कि जनता कि इच्छा हीं सरकार की सत्ता का
आधार होगा,लेकिन सरकार में तो कहीं भी जनता की इच्छा नहीं झलकती है ।
अमेरिका सीरिया पर सीमित आक्रमण करना चाहता है
क्योंकि सीरिया ने अपने हीं जनता पर रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया है । इस
मामले में रुस सहित कई राष्ट्रों का मानना है कि इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है
कि रासायनिक हथियारों का प्रयोग सीरिया
सरकार ने हीं किया है । अगर हम इस बात को मान भी लें कि रासायनिक हथियारों का
प्रयोग सीरिया सरकार ने नहीं किया है,तो फिर अभी तक जो लाखों लोग मारे गये हैं,
उसका क्या ? लाखों लोग किसी बड़े युद्ध में हीं मारे जाते
हैं, लेकिन यहां तो बसर अल असद की तानाशाही से लाखों लोग मारे गये हैं । क्या किसी
तानाशाह को यू हीं लाखों लोगों को मारने की आजादी होनी चाहिए ? तो फिर संयुक्त राष्ट्र और उसके मानवाधिकार
घोषणापत्र का क्या फायदा ? केवल इस मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर
हीं बसर अल असद पर कार्रवाई होनी चाहिए थी । लेकिन विश्व के देशों ने
मानवाधिकारों की रक्षा के बजाय , अपने-अपने राजनीतिक हित पर ज्यादा जोर दिया ।
भारत के अहस्तक्षेप की नीति भी इस मामले में सही नहीं है, क्योंकि अब
वैश्विक परिदृश्य बदल चुका है । एक देश की अव्यवस्था का प्रभाव पूरी दुनियां पर पड़ता
है । भारत सहित कई देशों की मुद्रा में गिरावट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है । इस तरह
की राजनीतिक अव्यवस्था आतंकवादी घटनाओं को भी बढ़ावा देती है । इस तरह के मामलें
में भले आप दूर रहें, लेकिन आपपर उसका प्रभाव पड़ना हीं है । तो फिर क्यों नहीं एक
वैश्विक निस्कर्ष पर पहुंचा जाये ? इस तरह आज के समय
में एक तर्कसंगत हस्तक्षेप की नीति अहस्तक्षेप की नीति से ज्यादा बेहतर है ।
संयुक्त राष्ट्र ,रुस ,चीन सहित कई राष्ट्र मानते हैं कि अमेरिका का एकतरफा
हस्तक्षेप उसके आक्रमकता को दर्शाता है । तब सबाल यह उठता है कि कोई राष्ट्र
मानवाधिकारों की रक्षा में आक्रमकता नहीं दिखायेगा ,तो फिर और किसमें दिखायेगा ।
हालांकि वियतनाम , इराक ,अफगानिस्तान में अमेरिकी हस्तक्षेप का परिणाम बहुत बुरा
रहा था, लेकिन सीरिया का मामला उससे अलग है हैं । लाखों लोग अपने हीं देश में
शरणार्थी बनकर रह रहें हैं । इसके बाबजूद भी राष्ट्रपति बसर अल असद विश्व समुदाय
की बात मानने को तैयार नहीं है । आम जनता सड़कों पर है । क्या कोई व्यक्ति राष्ट्र
से उपर है ? राष्ट्र व्यक्ति के लिए या फिर व्यक्ति राष्ट्र
के लिए ? उस विशेषाधिकार (संप्रभूता) का क्या मतलब जो मानवाधिकारों
की रक्षा हीं न कर सके ?
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